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हम ध्यान करेंगे – 01

हम ध्यान करेंगे – 01

श्रद्धा संपन्न भक्त गण,

हमें सोचना चाहिए कि हम अपने जीवन लाभदायक बनाते रहे। हमारे जीवन लाभदायक बनाने में हम असफल रहे तो हम ऐसे व्यक्ति बन जाएँगे, जिन्होंने महा लाभ को छोड़ दिया है। भगवान बुद्ध जी ने हमें दिखा दिया है कि किसी ने ठीक समय पर चार कारणों का अभ्यास किया है तो वह अर्हंत तक अपनी जीवन की वृद्धि कर सकता। ये चार कारण हैं-

ठीक समय पर धर्म का श्रवण करना,
ठीक समय पर धर्मों की चर्चा करना,
ठीक समय पर समथ भावना का अभ्यास करना,
ठीक समय पर विदर्षना भावना की वृद्धि करना.

जो व्यक्ति ठीक समय पर इन बातों का अभ्यास करता रहता है, तो उसे अवष्य ’अर्हंत‘ तक अपने जीवन की वृद्धि कर लेने का मौका मिलता है। यह कथन हमारे लिए उचित है या नहीं…..? उसके बारे में आपको भरोसा है या नहीं…? हम उस धर्म के प्रति विष्वास रखना अच्छा है या नहीं…? जब कोई इस धर्म के प्रति आस्था रखने का मतलब क्या यही होता है कि उसके मन में ऐसी भावना उत्पन्न होता है कि ’’मैं ही कर सकता हूँ ?‘‘…नहीं। मैं यह कह रहा हूँ कि ’’ भगवान बुद्ध जी ने जो प्रवचन दे दिया तो, हम उनके अनुसार अभ्यास करेंगे, उन पर भरोसा रखेंगे।‘‘ हम जो कुछ करने की कलपना अपने पर नहीं, उन भगवान बुद्ध जी पर विष्वास रखकर ही करेंगे। तब हम जरूर अपने बारे में ठीक अनुमान लगा सकते और हम अपने यथा स्वभाव पर आ जाते है। इसलिए हमें मालूम पड़ता है कि ’’मुझे क्या करना चाहिए‘‘।

सामान्यतः पहली बार भावना करनेवालों में अधिक लोग केवल भावना करना ही चाहते हैं, किताब पड़ना नहीं चाहते,धर्म की चर्चा करने और धर्म का श्रवण करना नहीं चाहते। पर याद रखना, हम इन चार कारणों का अभ्यास करना आवष्यक है। हर वक्त इनका अभ्यास करना चाहिए। इनका अभ्यास करते हुए हमें आगे जाना है, क्योंकि ये चार कारण (बातें) निर्वाण-पथ पर चलने के लिए अनिवार्य है।

जो कोई भावना करना चाहता है, तो प्रायः वह पूछता है कि हम क्या करेंगे..? कैसे करेंगे…? ऐसी अवस्था पर हम उसे क्या सिखाएँगे…कैसे हम उसे रास्ता दिखाएँगे…?

भगवान बुद्ध जी ने हमें अभ्यास करने के लिए चार कारणों को सिखा दिया है। जो कोई ठीक समय पर धर्म-श्रवण, धर्म की चर्चा, समथ और विदर्षना आदि चार बातों का अभ्यास करता है तो वही अर्हंत तक अपने मन की वृद्धि कर लेता है। तो फिर हमें किसी को इन चार कारणों की ओर मुड़वाना चाहिए। धर्म-श्रवण, धर्म की चर्चा, इन दोनों बातों से क्या किया जाता है….? इन दो बातों से अच्छा धर्म ज्ञान बना लेने में सहायता मिलती है। समथ और विदर्षना से भावना (ध्यान लगाना) की वृद्धि होती है। तो फिर देखो, हम संक्षेप में ले लिया जाए तो, धर्म-ज्ञान भी चाहिए और ध्यान लगाना भी चाहिए। ये दोनों बातों की ज़रूरत है न…..? धर्म-ज्ञान की वृद्धि भी कर लेनी चाहिए और भावना करना भी चाहिए।

मगर देखिए, बहुत लोगों का ख्याल है कि ’’हम धर्म सीख लेने के बाद भावना करेंगे‘‘ और कुछ लोगों की धारणा है कि ’’ भावना करना खत्म होने के पष्चात ही धर्म सीख लेंगे।‘‘ तो क्या यह बात ठीक है ? नहीं…यह ठीक नहीं है। हम इन बातों को ठीक तरह समझना आवष्यक है, तो फिर हम ये दोनों बातें कैसे करेंगे….? ठीक समय पर करना चाहिए। धर्म-ज्ञान की उत्पत्ति एवं भावना करना (ध्यान लगाना) ये दोनों ही बराबर करते जाना अनिवार्य है। धर्म-ज्ञान पूरा कर लेने के बाद ध्यान लगाना या ध्यान लगाना समाप्त होने के बाद धर्म सीखना ठीक नहीं है। ये दोनों काम बराबर करते जाना आवष्यक है। इसका कारण यह होता है कि भावना का मतलब क्या होता है….भावना कैसे किया जाता है…..ये सब धर्म में ही समाहित हैं। तो फिर धर्म-ज्ञान के बिना भावना की बातें नहीं की जा सकती और धर्म-ज्ञान के बिना भावना करने का अभिप्राय प्राप्त किया नहीं जा सकता। उसी तरह हमारे पास कुछ धर्म-ज्ञान है, तो भावना करने से ही हमें वह धर्म-ज्ञान प्रत्यक्ष हो जाता है और वह हमारे जीवन की भलाई के लिए सहायक बनता है। नहीं है तो वह धर्म-ज्ञान हमारे उपकार के रुप में नहीं रह जाता। जैसे खाना बनाकर मेज़ पर रख दिया जाता है, लेकिन हम खाना नहीं लेते। हमारे जीवन के लिए भोजनों का प्रयोजन पाने के लिए उनका प्रयोग करना आवष्यक है। उसी तरह भावना करने से भगवान बुद्ध जी का धर्म हमारे जीवन से बद्ध होता है और धर्म से हमारे जीवन की वृद्धि हो जाती है। इसलिए हमें भावना भी करना चाहिए।

लेकिन धर्म-ज्ञान के बिना भावना किया जाए तो वह बनाने के बिना खाना खाने के समान है……तो क्या खाया जाता है….हवा खाना पड़ता है। उसी तरह बनाया हुआ खाना है, लेकिन खाना नहीं लिया जाता तो वह भी ठीक काम नहीं है, अनर्थ काम है। तो फिर हमें धर्म-ज्ञान की वृद्धि कर लेनी चाहिए और भावना की वृद्धि भी। ये दोनों बराबर कर लेना अनिवार्य है।

किसी में धर्म-ज्ञान है, लेकिन वह भावना नहीं करता, तो किसी समय वह अपने मन की रक्षा नहीं कर पाता। वह बिना छत के घर के समान है, जिसमें दीवारें हैं, सुंदर है, लेकिन इसमें छत नहीं है। उसी तरह जो कोई भावना करता है, पर जिसमें धर्म-ज्ञान नहीं है, जैसे किसी घर के ऊपर छत तो है, पर जिसमें दीवारें नहीं हैं, इसलिए कालांतर में यह घर जानवरों का अड्डा बन जाता है। तत्पष्चात वहाँ अच्छी परिस्थिति का निर्माण नहीं होता। जिस प्रकार अच्छे घर के लिए दीवारें और छत दोनों की जरूरत है, उसी प्रकार हमें धर्म-ज्ञान को उत्पन्न कर लेना व भावना करना एक साथ किया जाना चाहिए, बराबर करते जाना चाहिए। यह बात हमें ठीक तरह समझ लेना आवष्यक है। अगर हम इन बातों को ठीक तरह समझ लेंगे तो हम भगवान बुद्ध जी के द्वारा दिखाये गये मार्ग पर चलकर हमारे जीवन की वृद्धि अर्हंत की सीमा तक बढ़ा सकती।

अगर हम भावना के बारे में बात करेंगे तो, षुरू से ही इसकी आदत भी हमें धीरे-धीरे डालनी चाहिए। घबराकर यह काम नहीं कर सकता। गड़बड़ होकर ये कुछ भी नहीं कर सकता। भावना धीरे-धीरे करना चाहिए। धीरे-धीरे हमें भावना करने की आदत डालनी पड़ती है। सबसे पहसे केवल पाँच मिनट भी भावना के लिए काफी है। आदत पड़ने के बाद हम देर तक भावना कर सकते हैं, किन्तु बहुत लोगों को इन बातों को समझ में नहीं आता। इसलिए ऐसे पूछनेवाले लोग भी हैं कि ’’भावना, जो आधे घंटे तक चलता है, पांच मिनट में कैसे किया जाए।‘‘ पांच मिनट का मतलब ’’ठीक पाँच मिनट नहीं, बल्कि थोड़ा समय भावना करके आदत पड़ना‘‘ होता है।

मैं एक बात बता दूँ कि आप लोगों ने गिटार जैसे बाजा बजानेवालों को देखा है न….? वे लोग आकर फौरन बाजा बजाते हैं क्या…? संगीत आरंभ करने से पहले वे वाद्य यंत्रों को मिलाते (ट्यून करना) हैं न ? ढोल बजानेवाले भी आकर फौरन ढोल बजाते हैं क्या.. ? ऐसे बजानेवाले भी है, तब क्या होता है..? तब या तो उनका बाजा टूट जाता है या सुननेवालों को उनकी ध्वनि पसंद में नहीं आती। उससे मधुर ध्वनि नहीं निकलती। उस ढंग से मधुर ध्वनि की उत्पत्ति नहीं की जा सकती। इसलिए षिल्प जाननेवाले लोग क्या करते हैं ? वे टियून करने के बाद ही बाजा बजाते हैं। इस तरह भावना करने के लिए भी हमें अभ्यास करना पड़ता है। आदत पड़ने के बाद ही लगातार भावना करने की क्षमता उत्पन्न होती है। भावना में हम क्या करते हैं ? भावना करने का मतलब होता है कि स्मरण की वृद्धि किया जाना। स्मृति की वृद्धि के लिए हमारे पास क्या होना चाहिए ? स्मृति की वृद्धि के लिए स्मृति की ही आवष्यकता है। स्मृति से ही स्मृति (स्मरण-षक्ति) की वृद्धि की जाती है, और किसी से नहीं। तो फिर स्मरण-षक्ति (स्मृति) की वृद्धि के लिए ही धीरे-धीरे भावना करने की आदत डालनी पड़ती है। वह काम वैसा है, जैसे कोई बीज रोपण किया जाता है। बीज रोपण करने के बाद तुरंत उससे एक महा वृक्ष का निर्माण नहीं होता। नहीं …हमें उसकी देख-भाल बच्चे से ज्यादा बहुत प्यार और करुणा से करनी चाहिए। उस तरह की चीज़ है, स्मृति (स्मरण-षक्ति) भी। सबसे पहले हमें स्मृति को पैदा करना चाहिए। स्मृति की उत्पत्ति कर लेने के बाद ही उसकी वृद्धि किया जाना आवष्यक है। आरंभ में स्मृति को पैदा करने के लिए भावना ही सहायक बनती है,साथ ही साथ स्मरण-षक्ति की वृद्धि के लिए भी हम भावना ही करते हैं। तो फिर उस के लिए धर्म-ज्ञान की जरूरत है01। स्मृति की उत्पत्ति और वृद्धि दोनों के लिए धर्म-ज्ञान की जरूरत है। हमारे पास धर्म-ज्ञान नहीं है तो हम स्मरण-षक्ति की वृद्धि नहीं कर सकते, क्योंकि हमें मालूम नहीं है कि हम क्या करते हैं?

भगवान बुद्ध जी ने उस निर्वाण-मार्ग को दिखाया है। उन्होंने स्मृति की वृद्धि की जाने की तरीका बता दी है। हमें इन बातों की जानकारी नहीं है, इसलिए हमें धर्म-ज्ञान की ज़रूरत है। धर्म में ही यह बात समाहित है कि अब इस प्रकार कीजिए, अब इस प्रकार कीजिए। तो फिर हमें उस धर्म की जरूरत है, जिसने स्मृति की वृद्धि की जाने की बात बता दी है। लेकिन पृथक-पृथक जगह पर इस धर्म की वृद्धि करने का ढंग और किये जाने का काम भी पृथक है। सभी अवसरों पर एक ही बात नहीं करना है। इसलिए कहते हैं कि ठीक समय पर धर्म श्रवण और धर्मों की चर्चा किया जाना चाहिए। षील का अभ्यास करते समय हमें षील से संबंध धर्म की बातें करनी चाहिए, षील से संबंध धर्म को सीखना चाहिए। समाधि का अभ्यास करते समय उससे संबंधित धर्म को सीखना चाहिए और समाधि से संबंधित धर्म की चर्चा करनी चाहिए। प्रज्ञा का अभ्यास करते समय उससे संबंध धर्म को सीखना आवष्यक है और उसका अभ्यास करना अवष्यक है।

ध्यान लगाते समय समाधि की वृद्धि के लिए आवष्यक धर्म की बातें सीखना चाहिए, धर्म की चर्चा करनी चाहिए, जिसे कहते हैं कि ठीक समय पर धर्म का श्रवण और धर्म की चर्चा। अब हम लोग प्रायः आरंभ में ही समाधि के बारे में सीखना चाहते हैं और पूछते हैं कि वह कैसा है…..? यह कैसा है…? उस समाधि को कैसा लिया जाए…? तब वह कभी पवित्र ज्ञान, पवित्र बोध की ओर नहीं जा सकता। वह विशय उसकी समझ में क्यूँ नहीं आती…? बहुत लोग मुझसे पूछते थे कि निरोध समापत्ति कैसी ली जाए, इसकी प्राप्ति के बाद क्या होता है…? उनके मन में श्रद्धा न होने के फलस्वरूप इस प्रकार के प्रष्न उठ जाते हैं। अगर हमारे मन में श्रद्धा है तो, हम ’ठीक समय पर धर्म-श्रवण और ठीक समय पर धर्म की चर्चा का अर्थ जानते हैं तो, हमें मालूम है कि धर्म-मार्ग में हम कहाँ रहते हैं। इसलिए मैंने कहा कि ’’ पाठषाला की प्राथमिक या द्वितीय कक्षा में पढ़ाई करनेवाले छात्रों को पयितगरस-प्रमेय सीखने का प्रयत्न किया जाए तो यह ठीक है…? पाठषाला की नवीं या दसवीं कक्षा में गणित विशय के लिए ऐसी बात पढ़ाई जाती है न….? जिस तरह नवीं या दसवीं कक्षा का विशय-सामग्री छोटी कक्षा का छात्र समझ नहीं पाता, उसी तरह वह व्यक्ति, जिसमें श्रद्धा एवं पर्याप्त धर्म-ज्ञान नहीं है, धर्म-मार्ग में अपना स्थान समझ नहीं पाता। हमें यह बात जानना जरूरी है कि हम कहाँ (धर्म-मार्ग में) रहते हैं और क्या करना चाहिए..?, जिसके लिए हमें कल्याणकारी मित्रों के उपदेषों को सुनने की आवष्यकता है।

भावना में सफलता पाने के लिए हममें दो बातें होनी चाहिए। पहली बात यह है कि हममें स्मृति होनी चाहिए, बुद्धि होनी चाहिए। साथ-साथ हम आज्ञाकारी व्यक्ति होना चाहिए और जो बात कहा जाता है, हममें उसे सुनने की क्षमता होनी चाहिए। ये दोनों बातें या दोनों में से एक बात हममें होनी चाहिए। तब हम जीत ले सकती है। ये दोनों बातें नहीं है तो हम थोड़ा सा अच्छा फल भी नहीं ले सकता। अधिक लोगों में ये दोनों ही बातें समाहित नहीं है। इन लोगों में अपनी स्मृति भी नहीं है, कही जानेवाली बात भी वे नहीं सुनते। उसके लिए मन लगाने की क्षमता भी उनमें नहीं है।

स्मरण-षक्ति और ज्ञान है तो हम श्रद्धा की उत्पत्ति कर सकती। जो कोई श्रद्धा में रहेगा तो उसे भगवान बुद्ध जी के द्वारा बताये गये धर्म-मार्ग पर चलने का मौका मिलता है। इसलिए उसके लिए ठीक समय पर मन की तैयारी कर लेना चाहिए, जो श्रद्ध से संपन्न होकर किया जाना आवष्यक है। इसलिए भावना में रुचि रखनेवाले, आरंभ में मत घबराइए। इसका मतलब यह नहीं है कि अंत में घबराइए। आरंभ में घबराहट न करनेवाला अंत में भी नहीं घबराता। आरंभ में घबरानेवाला क्या करता..? वह घबराहट से ही यात्रा की समाप्ति करता है। वह घबराहट से ही निर्वाण-मार्ग की समाप्ति कर लेता है। इसलिए मत घबराइए। किसी भावना का अभ्यास धीरे-धीरे कीजिए। थोड़ा सा समय लेकर स्मृति की वृद्धि कीजिए। भावना में जो कुछ करना है, उन्हें होष में कीजिए। वह पल, दो पल के लिए भी काफी है। हम सोचेंगे कि हम मैत्री भावना करने जा रहे हैं, तो भावना-मनसिकार (गहन विचार) अर्थात भावना करने में उपयोग की जानेवाले जो वचन है, उनकी याद करते हुए स्मृति की रक्षा करने का प्रयत्न कीजिए। होष में रहने की कोषिष कीजिए। वही प्रयत्न हमें सबसे पहले करना आवष्यक है। इस प्रकार हम भावना करते जाएँ तो हमें मालूम पड़ता है कि अब हम इसे (भावना) होष में कर सकते।

’स्मृति‘(सिहिय) का अर्थ यह है कि बाहर जाने के बिना मन को स्थिर रूप में रखा जाना। इधर-उधर घूमना, मन का स्वभाव है। नहीं है तो नींद आ जाती है या मन नीवरण के अधीन हो जाता है। नीवरण के अधीन न होकर मनसिकार (गहन विचार) करने के लिए मन को बना लेना चाहिए। अगर हम कई घंटे तक लगातार भावना करें तब भी हम अपनी स्मृति संभाल न पाते, क्योंकि हमारी स्मरण-षक्ति की वृद्धि नहीं हुई और ऐसी स्मृति के साथ हम काम करने जा रहे हैं। कहते हैं कि हमें जल्दी ही हमारे क्लेषों को मिटाना चाहिए। इसलिए षुरू में घंटों तक ध्यान लगाते रहते हैं, स्मृति की वृद्धि नहीं हो जाती और ऐसी स्मृति के साथ वे काम करने जाते हैं,तब उनकी स्मृति टूट जाती है। अंत में अनेक पीड़ाएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए हम स्मृति की वृद्धि कर लेना आवष्यक है। वन को काटने से पहले हमें अपने अस्त्रों को ठीक तरह तैयार कर लेना चाहिए। तो क्लेष-युद्ध की जीत भावना से प्राप्त की जाती है। क्लेषों को पराजित करने के लिए, अत्यन्त कठिन काम को सफल बनाने के लिए तो हमें अपनी सुध-बुध की वृद्धि करनी पड़ती है। स्मृति की वृद्धि भावना से हो जाती है। स्मृति की वृद्धि होने के लिए तो उसकी उत्पत्ति की जानी पड़ती है। जिस स्मृति को हमने पैदा किया है, उस स्मृति को सवंर्धन करन की क्षमता भी हममें समाहित है। इसलिए भावना का अभ्यास करते समय षुरू से ही धीरे-धीरे अपनी स्मरण-षक्ति को बढ़ाने की कोषिष कीजिए। वह पाँच मिनट के लिए भी काफी है। थोड़ा-थोड़ा समय तक भावना करके अपना होष संभालिए। तब अपने को मालूम पड़ेगा कि अपना होष आ गया है। ऐसी स्थिति में ध्यान लगाते समय हमें नींद नहीं आती और मन इधर-उधर नहीं भटकता। इसलिए जान पड़ता है कि अपन में भावना-मनसिकार (गहन-विचार) करने की क्षमता आ गयी है। तब ध्यान लगाने का समय बढ़ाइए। साधरणतः आधे घंटे तक भावना किया जाता है। इसलिए आधे घंटे तक ध्यान लगाने का समय बढ़ाइए। कोई एक हफते में गहन-विचार कर सकता है तो कोई दो हफते में। कोई भावना में मन लगाने की क्षमता एक महीने में पा सकता है तो किसी को इससे ज्यादा वक्त लगेगा। तो कोई बात नहीं। भावना में यह इतना महत्व नहीं होता कि गहन- विचार (भावना-मनसिकार) करने में थोड़ा समय लगेगा या अधिक समय। स्मृति की सुरक्षा ही महत्वपूर्ण बात है। एक वर्श नहीं,बल्कि दस वर्श बीत जाएँ, तो कोई बात नहीं, स्मरण-षक्ति पाने की कोषिष कीजिए। इसके लिए (स्मृति पाने के लिए ) लगन से अभ्यास कीजिए।

कोई एक या दो हफते में स्मरण-षक्ति पाता है,लेकिन हमें एक दूसरे का स्वभाव मालूम नहीं पड़ता। फिर भी कोई ऐसा फैसला मत कीजिए कि मैं बहुत जल्दी यह काम सफल बनाऊँगा। हमें क्या करना है…? धारण कीजिए कि ’’मुझे स्मरण-षक्ति का उत्पादन करना चाहिए‘‘ और यह कल्पना छोडि़ए कि ‘‘मैं जल्दी यह काम पूरा करूँगा।’’ उसके बाद धीरे-धीरे स्मृति को उपजाइए। इस प्रकार स्मृति पैदा कर लेने के बाद ज्ञात होता है कि ’’अब मैं नींद के अधीन न होकर, मन बिखराने के बिना गहन-विचार कर सकता है।‘‘ तत्पष्चात धीरे-धीरे ध्यान लगाने का समय लंबा कीजिए। तब कालांतर में हमें सुध-बुध से ध्यान लगाने का मौका मिलता है।

फिर भी कोई ’’मैं एक घंटा ध्यान में रहूँगा, आधा घंटा रहूँगा‘‘ सोचकर आधा घंटा नहीं पाँच घंटे भी रहेगा, लेकिन उसे नींद आ जाती है या उसका मन कहीं भटक रहा है। ऐसी हालत में एक घंटा तो क्या आधा दिन भी बीत जाए, कोई फायदा नहीं मिलता। स्मृति को पैदाकर पाँच मिनट के लिए भी भावना करना काफी है, जिससे धर्म की वृद्धि किये जाने का अवसर मिलता है। फल सहित मार्ग यही है। स्मृति के बिना पाँच घंटे भी बीत जाएँ, कोई फायदा नहीं मिलता, लेकिन बाहरवाले तो सोचेंगे कि ’’ अरे, वा तोे अच्छी तरह भावना करता है।‘‘ इससे हमें कोई काम नहीं हैं और हम भी कहेंगे कि ’’मैंने भी अच्छी तरह भावना किया है और कई घंटे तक भावना किया है। ये बातें तो बकवास करने के लिए उचित हैं, लेकिन हमने सच्ची बात नहीं ली, इसलिए आरंभ में थोड़ा-थोड़ा समय भावना करके स्मरण उपजाने का प्रयत्न कीजिए। उसके बाद हमें धीरे-धीरे भावना की वृद्धि करने का अवसर मिलता है।

हम आषीर्वाद देते हैं कि सभी को स्मृति उपजाने का भाग्य मिलें।

नावलपिठिये अरियवंश भन्ते जी

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